कभी तो…  (कहानी) –  डॉ. सुधाकर आशावादी

vivratidarpan.com – बहुत दिनों से जाने कितना कचरा भरे बैठी थी दिमाग में। आखिर उसे मौका मिल ही गया कचरे से भरे डस्टबिन को खाली करने का। उसने अपने मन की कर ही ली।
वह बोली – ‘आखिर खुद को समझती क्या है चुड़ैल, जानती नहीं क्या शादी से पहले कितने गुल खिलाए हैं इसने, शादी से पहले ही लिव इन में रह रही थी, आज अपने आप को सती सावित्री जता रही है। सौ चूहे खाकर चली है हज करने।’
सुमिता ने कहा भी -‘ शकुन चुप हो जा, अपने पारिवारिक उत्सव को खराब नहीं किया करते। नाते रिश्तेदार ही नहीं, मुहल्ले पड़ौस वाले सब हैं यहाँ, सबके सामने क्यों किसी की इज्जत खराब करने पर तुली है?’
‘मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, जो जैसी है, मैं बताकर रहूंगी।’ शकुन का क्रोध कम नहीं हुआ था, वैसे भी मन की भड़ास निकलने के लिए इससे अधिक उपयुक्त समय और क्या हो सकता था, जब उसके सम्मुख उत्तरदाता कोई था ही नही।
आखिर कब तक भड़ास निकालती, वह चुप हो गई, किन्तु उसके वचन रिश्तेदारों के मस्तिष्क में घर कर गए, वह कयास लगाने लगे कि शकुन ने किसके संबंध में अपनी खीज उतारी है, है तो अवश्य ही कोई निकट संबंधी , जिसके प्रति इसके मन में इतना ज़हर भरा है. यदि ज़हर न भरा होता, तो उगलती ही क्यों ?
बात आई गई हो गई। शकुन संतुष्ट थी, उसे अपने किये पर कोई पछतावा नहीं था। ‘बहुत दिनों से दिमाग को दही बना रखा था रिया की हरकतों ने, सदैव उसकी बेटियों को नीचा दिखाने की जुगत में रहती थी वह। एक दिन दिव्या अपने बॉय फ्रेंड के साथ हिल स्टेशन क्या चली गई , बखेड़ा खड़ा कर दिया इसने। नौकरी कर रही है, काम के सिलसिले में हिल स्टेशन चली गई तो क्या गलत हो गया ? सारी रिश्तेदारी में बता दिया कि दिव्या भी किसी से कम नहीं, निहारिका को भी खूब बदनाम किया था इसने, जाने कैसे कैसे आरोप लगाए, को एड में पढ़ेगी तो दोस्तों के साथ घूमे फिरेगी भी। अरे जब लड़कियां नौकरी करेंगी, तो घर से बाहर रहेंगी ही, वहां वे किस से बात कर रही हैं किस से नहीं, कौन जानता है। मुझे तो अपनी बेटियों पर पूरा भरोसा है, मैंने उन्हें कभी गलत शिक्षा दी ही नहीं। शादी से पहले वे ऐसा कोई काम कर ही नहीं सकती, जिससे मुझे कोई शर्मिंदा कर सके।’ स्वयं से ही बात कर रही थी शकुन।
बात आगे बढ़नी ही थी, रिया को शकुन के इस एपिसोड का पता चला तो बिफर गई। कहने लगी- ‘अब जरा हिंदी में समझाऊंगी शकुन मौसी को, यह तो शकुनि से भी अधिक चालाक समझ रही हैं अपने आप को। अपनी बेटियों पर तो कोई अंकुश नहीं, चली हैं दूसरों की बेटियों पर इल्ज़ाम लगाने। जिसके खुद के घर काँच के होते हैं, वे औरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। मेरे बारे में बुरा भला कहेंगी, मैंने तो जिससे प्यार किया उसी से शादी भी की, अपनी बेटियों को नहीं देखती कि कहाँ कहाँ मुँह मारती फिरती हैं।’
माँ ने कमान संभाली, रिया को समझाया -‘यदि कोई तुम्हारे पीठ पीछे कुछ कह रहा है, तो उसकी बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए, क्या पता किस बात से नाराज हो गई हो। जरूर तेरी किसी बात पर शकुन को क्रोध आया हो अन्यथा शकुन ऐसी नहीं है।’
‘मम्मी तुम कभी अपनी बहन की बुराई नहीं सुन सकती, तुम्हें सब पता है, फिर भी तुम उन्हें और उनकी बेटियों को कभी बुरा नहीं कहती।’ रिया माँ से ही उलझ पड़ी – ‘ तुमने मुझे इस बारे में कभी नहीं बताया, वो तो और ही हैं, जो मेरे सगे हैं, जिन्होंने मुझे बताया कि रिश्तेदारों की भरी भीड़ में वह कैसे मेरे बारे में उल्टा सीधा बोल रही थी।’
‘बेटी कोई रिश्तेदार किसी का सगा नहीं होता, सब एक दूसरे को लड़वाकर तमाशा देखने वाले होते हैं, तूने भी तो किसी और कि बातों में आकर दिव्या और निहारिका को अपनी दुश्मन बना रखा है, सारे रिश्तेदारी में उनकी छवि खराब कर रखी है, जिसे जब मौका मिलता है, वह उसे भुनाता ही है, तेरी मौसी को उस समय मौका मिल गया, सो रिश्तेदारों के सामने उसने भी खूब भड़ास निकाल ली।’ माँ ने रिया को समझाने का भरसक प्रयास किया, मगर रिया कब समझने वाली थी।
यूँ तो रिया, दिव्या और निहारिका मौसेरी बहनें थी लेकिन उनके मध्य शीत युद्ध बरसों से चल रहा था, फिर भी आमने सामने होने पर ऐसी स्थिति कभी उत्पन्न नहीं हुई थी, कि किसी ने भी किसी के प्रति कटुता का परिचय दिया हो। रिया के सामने आते ही शकुन उससे ऐसा व्यवहार करती थी, जैसे कि रिया उसकी अपनी बेटियों से भी अधिक उसकी सगी हो, मगर अपनी बेटियों से तुलना करते हुए शकुन के अन्तस् में जलन की अग्नि धधक रही थी, कुछ निकट संबंधी उसे शांत नहीं होने देने चाह रहे थे,सो वे भी उसमें घी की आहुतियां देने में पीछे नहीं थे। उधर रिया को भी भड़काने में उन्ही निकट संबंधियों की विशेष भूमिका थी।
एक लम्बे अंतराल तक रिया और शकुन के बीच कोई बात नहीं हुई। इस विवाद में शकुन का अपने अनेक रिश्तेदारों से मोहभंग हो गया, वह समझती थी, कि उसके निकट संबंधी उसके द्वारा कहे गए कटुवचनों के समर्थन में आकर रिया के परिवार से दूरी बना लेंगे, किन्तु मन का सोचा कब पूरा होता है। वह अनेक संबंधियों से कट चुकी थी।
रिया शांत थी। एक दिवस शकुन का रिया की माँ के पास फोन आया – दीदी …कैसी हो ?
‘ठीक ही हूँ…।’ रिया की माँ ने संक्षिप्त उत्तर दिया।
‘नाराज हो… ?’ शकुन ने पूछा।
‘नहीं तो…।’ पुनः संक्षिप्त उत्तर मिला।
‘मुझे आपसे क्षमा मांगनी है..।’
‘क्यों …?
‘अपने अपशब्दों के लिए।’
‘उससे क्या होगा ?’ रिया की माँ ने कहा।
‘कुछ तो… मैं अपराधबोध से मुक्त हो जाउंगी।’ शकुन ने कहा।
‘क्या बीता वक़्त लौट आएगा …?’
शकुन से कुछ कहते न बना, उसने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। उसे लगा कि कुछ पल की बातों ने उसे अपनी बहन से कोसों दूर कर दिया है। (विनायक फीचर्स)

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