वह लगातार
प्रयत्नशील है,
जलाकर अपना शील।
चारों तरफ
आक्रांताओं का आतंक,
अंदर से, बाहर से—
घिरा हुआ है वह,
अपने ही वादों से,
जो उसने किए
अपने आप से,
अपने देश से।
पता है उसे,
आसान नहीं है राह
कर्तव्य-पथ पर।
काँटे बिछे हैं,
जगह-जगह पर।
लेकिन वह निडर है,
पहुंचेगा अपनी डगर।
डगर पर पहुंचकर,
वह फिर,
होगा शांत।
हम देखेंगे उसकी
महानिर्वाण-बुद्ध सी
एक झलक मुस्कान।
लेकिन!!
कब तक?
हम साथ देंगे—
तब तक।
* प्रदीप सहारे. नागपुर, महारष्ट्र
मोबाईल -7016700769
