कलाई पर एक डोर बँधती है
जो कहने को कच्चा धागा है
पर ये प्रेम की डोर है
यह डोर कहती है
कि मैं हूँ तुम्हारे साथ
चाहे तुम कहो या न कहो।
बहन की आँखों में बचपन की यादें पलती हैं
भाई के दिल में अनकहे सवाल उतरते हैं।
इस डोर में कोई शोर नहीं
कोई झंकार नहीं
सिर्फ़ एक वादा है
जो हर साल अपने आप को दोहराता है।
जब भी तुम्हें लगे कि तुम अकेले हो
ये डोर तुम्हें याद दिलाएगी
कि कोई तुम्हारे लिए खड़ा है
खामोशी में भी।
रक्षा बंधन का मतलब यही है
कि दूरी चाहे जितनी हो
हम कभी भी अलग नहीं होंगे।
©रुचि मित्तल, झझर , हरियाणा
