दूर दूर से काँवड आये, परम सुपावन काशी में।
मन में दृढ़ विश्वास जगाये, गोपेश्वर अविनाशी में।।
प्रेम भक्ति जल गागर लेकर, लोग शिवालय आते हैं।
दूध दही जल पत्र चढ़ाकर, महिमा शिव की गाते हैं।।
आशुतोष भोले शिव शंकर, शरण तुम्हारी आये हैं।
गौरापति हे शिव अभयंकर, तुम्हें मनाने आये हैं।।
बेल पत्र अरु भांग धतूरा, शिव के मन को भाते हैं।
उमापती डमरू कर धारी, आशुतोष कहलाते हैं।।
औघड़ दानी अरु कपाली, रहते धुनी रमाये हैं।
गणाध्यक्ष शंभो त्रिपुरारी, तन पर भस्म लगाये हैं।।
भाल सुशोभित चंद्र कला से,गल सर्पों की माला है।
जटा जूट से निकले गंगा, बलिहारी जग सारा है।।
श्रावण मास परम अति पावन, शिव शंकर को प्यारा है।
रिम झिम बूंदों की बारिश में, लगता अजब नज़ारा है।
इसी मास में तप के बल से, गौरा ने शिव पाये थे।
गरल पान कर शंकर भोले, नील कंठ कहलाये थे।।
देवों के शिव देव कहायें, शंकर सम को’ दूजा है।
कहते हैं शिव दीन हीन की, सेवा सच्ची पूजा है।।
श्रद्धा से जो पूजन करता, शिव-शक्ति को पाता है।
दुनिया के सुख भोग अंत में, मोक्ष धाम को जाता है।
नाद गूंजता दिशा दिशा में, बम बम भोले बाबा से।
दिव्य रूप गौरा का लगता, शिव शंकर की आभा से।
जल अभिषेक सदा प्रिय शिव को,वही चढ़ाने आते हैं।
शिव शंभू अपने भक्तों पर, दया दृष्टि बरसाते हैं
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून
