पिता की चिता धधक रही थी,
बेटा स्क्रीन पर जम्हाई ले रहा था।
आँखें भीगी थीं सबकी,
पर कैमरा फोकस ढूँढ रहा था।
अब रिश्तों का धर्म
नेटवर्क सिग्नल पर निर्भर है।
कंधा देने वाले नहीं,
बस रीएक्शन देने वाले रह गए हैं।
शादियाँ करोड़ों में सजती हैं,
फोटोशूट, लाइव-स्ट्रीम, हैशटैग।
पर माँ की साँसों को
कोई दो पल देने को तैयार नहीं।
हम इतने व्यस्त हो गए “सेट होने” में,
कि अपनों की “अंतिम सांसें”
बफरिंग में देख रहे हैं।
माँ की ममता अब रील है,
पिता की सीख बस वॉइस नोट।
क्या यही है रिश्तों की प्रगति?
या ये है रिश्तों का डिजिटल अंत?
समय रहते जागो—
वरना स्क्रीन पर दिखेगा बस यही,
“यू वेर ऑनलाइन,
बट नेवर ट्रूली विद मी।”
-डॉ अमित कुमार बिजनौरी
कदराबाद खुर्द, स्योहारा,
बिजनौर, उत्तर प्रदेश
