रिवाजों का कैसी रस्म है बनाई,
सही माँ ने बेटी की हरदम जुदाई।
जो आंगन में खेली चहकती हुई सी,
कभी मुस्कुराती कभी खिलखिलाती।
पहन पैजनिया जो चलती ठुमकती,
तो नन्हे से कदमों में खुशियां समाई।
नियम क्यों बनाया ये संसार ऐसा,
जिसे रखते पलकों पे करते विदाई।
– ज्योति श्रीवास्तव, नोएडा, उत्तर प्रदेश
