उम्र का पड़ाव – विनोद निराश

बालों की सफेदी, चेहरे की झुर्रियाँ,

धुँधली होती नयन ज्योति,

चश्मे का बढ़ता नंबर ,

अनवरत पनपती अनेकों लालसाएं,

ढलती उम्र में उम्र का पड़ाव बता रहा।

 

सोचता हूँ उर अन्तस के दरिया में,

बहुत खिंची मैंने ज़िम्मेदारियों की नाव,

खून-पसीने से सींचा घर का हर कोना,

हर क्षण रहा कर्तव्यबोध मुझे,

पर आज अदृश्य भय मुझे सता रहा।

 

अभाव संग तंगहाली देखी मगर,

सबके लिए हाथ खुला रखा,

ज़िंदगी कुछ इस कदर बसर हुई

खुद का ख्याल ही नहीं आया,

बस रिश्ते-नातों के ताने-बाने में उलझा रहा।

 

कभी बेटे का फ़र्ज़ निभाया,

कभी पत्नी का साथ निभाया,

किसी को गोद खिलाया,

किसी को ऊँगली पकड़ चलना सिखाया,

मकान की ईंट की तरहा सबसे चिपका रहा।

 

दिल में आस लिए अपेक्षा का सेतु बना रहा,

निराशा और उपेक्षा का भय सता रहा,

किंचित भयभीत नहीं हूँ कर्मफल से,

मगर मनोदशा भयभीत है एकाकीपन से,

जो उम्र का ये पड़ाव डरा रहा।

 

उम्र का अंतिम पड़ाव ढलती उम्र,

जैसे हो रहा हो सेवानिवृत कोई कार्मिक,

अनेको ख्वाहिशे, जीने की अशेष अभिलाषाऐ,

पनीले नयनो में दम तोड़ती आशाये,

वक़्त की गर्दिश में घिरा तन-मन घबरा रहा।

 

अपनी जरूरतों को पीछे धकेल,

लगा रहा ताउम्र हर किसी को खुश करने में,

बहुत की भागदौड़, मुसलसल चलता रहा,

हर किसी की सुनी, अपनी कह न पाया,

आज वक़्त आँखों से आभासी चश्मा हटा रहा।

 

मौत और ज़िंदगी की कश्मकश में,

वक़्त का आखेटक तीर चला रहा है,

अब भागते-भागते थक सा गया हूँ मैं,

शायद आखेट का समय आ गया,

आख़िरश निराश मन अब खुद को यही समझा रहा।

– विनोद निराश, देहरादून

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