vivratidarpan.com देहरादून – उत्तराखंड के धड़कते हृदय में स्थित अल्मोड़ा अनुपम छटा के साथ मिलकर अद्भुत हिमालयी सौंदर्य का दर्शन कराता है। अल्मोड़ा में स्थित चीतेई मंदिर, जहाँ पर हजारों घंटियाँ सकारात्मक ऊर्जा का भंडार हैं। स्थानीय बानड़ी देवी (विंध्यवासिनी देवी) यहाँ की आलोकिक छटा मन को मोह लेती है जंगल के बीच में वन देवी का मंदिर अपनी प्राकृतिक खूबसूरती से हर किसी को प्रसन्न कर देती हैं।तथा लमगड़ा–जलना से दिखाई देने वाली पंचचुली हिमशिखरों की दीप्तिमान शृंखला मन को अपार शांति, सुकून और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है।
प्रातःकालीन सूर्योदय की स्वर्णिम लालिमा जब इन पर्वत मालाओं पर बिखरती है तो प्रकृति स्वयं आह्लादित होकर नए रंगों से धरती को आलोकित कर देती है।अल्मोड़ा अपनी शांत जलवायु, सदाबहार घाटियाँ, देवदार-बुरांस-काफल के जंगल और नौला-धारों की शुद्ध जल के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की हवा में मिट्टी की सोंधी महक, पेड़ों की ताज़गी और प्रकृति का सुर-ताल सहज ही मन को मोहित कर लेते हैं। सुबह का हिमालय दर्शन और शाम की संध्या छाया अपने सौंदर्य में अभिभूत कर देती है।
यह नगर पहाड़ों की लोककला, संस्कृति, अध्यात्म, नृत्य और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत संसार समेटे हुए है। यहाँ का हर गाँव, पगडंडी, नौला, गधेरा तथा मंदिर अपनी मौन परंतु गहन कथा कहता है।
कुमाऊँनी भाषा में अनुपम आत्मीयता, सरलता और मधुरता का सम्मिश्रण है।
यहाँ के लोकगीत, छंद, झोड़ा, चांचरी, भगनौल, हल्दी एवं मांगल गीत, पर्व और त्योहारों से जुड़ी परंपराएँ अद्भुत भावसंसार रचती हैं। विवाह में गाया जाने वाला झोड़ा, उत्सवों पर चांचरी, महिलाओं द्वारा मांगल गीत, पारंपरिक महिला संगीत और ढोल-दमाऊँ की गूँज वातावरण को उत्सवरस से भर देती हैं।
कई प्रसिद्ध कुमाऊँनी लेखक और कवि यहाँ की बोली को साहित्य के ऊँचे शिखर पर पहुँचा चुके हैं। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपने काव्यसंग्रहों में कुमाऊँ की संस्कृति, सभ्यता और प्राकृतिक सौंदर्य को अद्भुत संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया है।
कुमाऊँ की पारंपरिक भेष–भूषा इसकी अनूठी सांस्कृतिक पहचान है।यहाँ की पहाड़ी नारियाँ अपनी रंग-बिरंगे पिछौड़ा, चमकदार नथ, झुमके और पारंपरिक आभूषणों में अलौकिक रूप से सुंदर दिखाई देती हैं। पिछौड़ा शुभता, सौभाग्य और परंपरा का पवित्र प्रतीक है।
सुसज्जित, सादगी और सौंदर्य से भरपूर नारियाँ अपनी संस्कृति को गर्व से उजागर करती हैं।
पुरुषों का परंपरागत भांगा-पायजामा, ऊनी वस्त्र और कुमाऊँनी टोपी यहाँ की जीवनशैली और जलवायु के अनुरूप है।
यह देवभूमि अपनी अलोकिक आध्यात्मिक ऊर्जा से सदैव मन को मोहित करती है।
अल्मोड़ा में नन्दा देवी कुमाऊँ की आराध्या शक्ति और मातृत्व की दैवी प्रतीक है माँ के दर्शन मन को प्रफुल्लित करते हैं चीतेई मंदिर गोलू देवता का पावन धाम है जहाँ घण्टियों की अनगिनत पंक्तियाँ श्रद्धा, विश्वास और न्याय के साक्ष्य हैं।यहाँ पर श्रद्धालु आकर अपनी मनोकामना को पूर्ण करने हेतु न्याय के देवता को पत्र लिखकर प्रार्थना करते हैं। यह एक अद्भुत नजारा होता है श्रदा भाव को देखकर मन खुश हो जाता है।
अल्मोड़ा में स्थित डोल आश्रम रमणीक तीर्थ है शांत, दिव्य और समाधिस्थ वातावरण से भरा साधना स्थल है। यहाँ पर आकर साक्षात ईश्वर के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। इन धामों की पवित्र वायु में भक्ति, विश्वास और अध्यात्म प्रकृति की सौंदर्यता सहज ही अनुभव किया जा सकता है
कुमाऊँ का जीवन प्रकृति की गोद में पनपता है। सीढ़ीनुमा खेत, धान, झंगोरा, मंडुवा, गहत, भट्ट और उड़द की फसलें यहाँ की कृषि परंपरा का अभिन्न अंग हैं। भट्ट की दाल, मडुए की रोटी, गहत की दाल, जखिया, आलू, भांग की चटनी, कुमाऊँनी रायता, सिंगौड़ी और बाल मिठाई में कुमाऊँ की विशिष्ट पहचान समाई है। ये व्यंजन स्वाद, स्वास्थ्य और परंपरा का समन्वय है।कुमाऊँ का प्रसिद्ध एपण कला शुभ प्रतीकों और लाल मिट्टी के पवित्र स्पर्श के कारण विशेष पहचान रखती है। विवाह, जन्म, त्योहार, उपनयन तथा हर मांगलिक अवसर पर देहरी और आँगन को एपण से सजाने की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। एपण की रेखाओं में सौभाग्य, समृद्धि और शुभकामनाओं का संदेश छिपा होता है।यहाँ पर हर घर में एपण की कलाकृति मनमोहक और आकर्षक होती है।अल्मोड़ा एक पर्यटन स्थल तथा जीवन, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम है। यहाँ की परंपराएँ, देवी-देवता, भाषा, भोजन, साहित्य और लोककला मिलकर इस भूमि को अद्वितीय बनाते हैं। कैची धाम की दिव्यता पवित्र मिट्टी की ख़ुशबू सैलानियो की श्रद्धा का प्रतीक है।
कुमाऊँ की यह पवित्र धरती
में मिट्टी की खुशबू भी कविता बन जाती है। सदियों से यात्री, भक्त, साहित्यकार और प्रकृतिप्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है।
~कविता बिष्ट ‘नेह’, देहरादून, उत्तराखंड
