एक झोंके की तरह यह उड़ गया है।
बर्फ के जैसे पिघल कर गल गया है।
पक्षी थक कर गिर गया हो जैसे नभ से ।।
हुआ धूमिल भोर के तारे के जैसे।
एक बुझते हुए अंगारे के जैसे।
हो गया हो विलग तन ज्यों आत्मा से।।
शंका की ही बिजलियों की रोशनी है।
अपनेपन की झलक दिखती ही नहीं है।
मिल गई है फिर कैकेयी मन्थरा से।।
कृतिम फूलों सा लगा गुलशन ये सारा।
अपने ही हाथों गया हर शख्स मारा।
मिल गयी ज्यों अप्सरा कुरूपता से।।
-नीलांजना गुप्ता, बाँदा, उत्तर प्रदेश
