इस मंजिल पर पहुंच नहीं पाया मैं – गुरुदीन वर्मा

 

सोचता हूँ दिन रात मैं,

लेकिन इस मंजिल तक,

पहुंच नहीं पाया मैं,

बिगाड़ता रहा हूँ अब तक,

मैं अपना कीमती समय,

इस मंजिल की तलाश में,

गुजारता रहा हूँ मैं,

बिना सोये अपनी रातें,

और रहती है हर समय,

अशांति मेरे दिलो-दिमाग में,

रहता हूँ बेसब्र मैं,

इस ऊंची उड़ान को।

 

बस में नहीं है मेरा हृदय,

देखती है स्वप्न मेरी आत्मा,

मेरे अजर-अमर होने का,

अपने दुश्मनों को भी,

अपना प्रिय बनाकर,

करती है दुहायें,

नास्तिक बनकर भी,

तलाशती है हजारों राहें,

इस मंजिल को पाने के लिए,

लेकिन एक प्रश्न इसने,

खुद से नहीं किया होगा,

कि स्वार्थी कौन है।

 

अपनी सारी खुशियां,

स्वयं आगे बढ़कर,

उसको देना चाहता है आदमी,

जिससे उसको आशा है,

अपने अनंत ख्वाब पूरे होने की,

सवाल यह भी है कि,

यह जीवन किस काम का है,

जुड़ते जाते हैं ऐसे अनेक प्रश्नोत्तर,

बनते जाते हैं ख्वाब-दर- ख्वाब,

लेकिन मुमकिन नहीं है,

हर स्वप्न का पूरा होना,

जैसे कि,

पहुंच नहीं पाया,

इस मंजिल तक मैं।

– गुरुदीन वर्मा.आज़ाद

तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)

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