लगता यहाँ हर आदमीं अंजान की तरह,
मतलब फरोशी हर घड़ी नादान की तरह।
सब फायदे के खेल में दौड़ें इधर उधर,
दहशत मचीं चारो तरफ तूफान की तरह।
गमगीन सी बहती हवा बेचैन है जिगर,
दिखता यहाँ हर आदमी बैमान की तरह।
खैरात पर सबकी नजर चारो तरफ ग़दर,
सब जी रहें हैं आजकल मस्तान की तरह।
बेजान से लगतें सभी उगलें सदा जहर,
मुस्कान भी तिरछी लगे किरपान की तरह।
दुनिया लगे वीरान सी कैसी बहें लहर,
पूजें किसे बोलो जरा भगवान की तरह।
बेहाल ‘अनि’ रहता सदा दिल में छिपा राज,
जीना यहाँ मुश्किल लगे इंसान की तरह।
– अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
