कभी जो गुजरो तुम उस गली से
अब भी तुम्हें वो वही मिलेगी,
सपन पले थे जो उन आँखों में
अनिमेष दृगों में वही पलेगी,
वैसे तो जलती रोज़ वो तिल तिल,
बिन तेरे उसकी चिता जलेगी|
जो लौटने में जरा देर कर दी
फिर वह कमी तुम्हें ताउम्र खलेगी।
सविता सिंह मीरा. जमशेदपुर
