(शेर)- किसको पसंद है यूँ अपनी जिंदगी को, दोज़ख बनाना।
मगर हालात कभी ऐसे होते हैं, आदमी मुजरिम बन जाता है।।
यूँ तो चाहते हैं सभी कि, वो किसी को परेशान नहीं करें।
क्या क्या करें इंसान भी, मजबूरी में वह जालिम भी बन जाता है।।
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वही मंजर है आज भी यहाँ, आजादी के बाद भी।
नहीं हुआ दर्द कम गरीब का, आजादी के बाद भी।।
नहीं हुए साकार सपनें, यतीम और मजदूर के।
मुकम्मल ख्वाब अमीरों के ही हुए, आजादी के बाद भी।।
वही मंजर है आज भी यहाँ——————-।।
वैसा ही शोषण है शोषितों का, वैसी ही जुबां है शोषकों की।
सच नहीं रुकी है बर्बादी गरीबों की, आजादी के बाद भी।।
वही कहानी है पढ़ने की, आज भी किताबों के पन्नों पर।
हाँ, बन्द नहीं हुई है खून की धारा, आजादी के बाद भी।।
वही मंजर है आज भी यहाँ———————।।
बिक रहा है धर्म आज भी, सरेआम बाजारों में।
कम नहीं हुए जुल्म नारी पर, आजादी के बाद भी।।
बांट रहे हैं हिन्दुस्तां को, जाति-भाषा, धर्म के नाम पर।
हाँ, होते हैं बलवें-फ़साद यहाँ, आजादी के बाद भी।।
वही मंजर है आज भी——————–।।
लूटपाट, चोरी, डकैती, वैश्यावृत्ति और कालाबाजारी।
हो रहा है सब कुछ यही यहाँ, आजादी के बाद भी।।
बन चुका है भ्रष्टाचार एक शिष्टाचार, हाँ, हर काम में।
हाँ, मौजूद है छुआछूत- भेदभाव, आजादी के बाद भी।।
वही मंजर है आज भी यहाँ——————–।।
– गुरुदीन वर्मा आज़ाद, तहसील एवं जिला-बारां (राजस्थान)
