आओ बादल गाँव हमारे,
तुमको खेतिहर रोज पुकारे।
बिन बूंदों के खेत सूख रहे,
निराशा उपज रही सकारे।
मंहगे मंहगे बीज खरीदे,
खाद के लिए हाथ पसारे।
जैसे-तैसे धान लगाया,
तुम बिन उसको कौन संभारे।।
तुम बिन सूखी ताल तलैया,
दादुर, मोर, भोर सुहानी।
कूप तड़ाग बाग़ सब व्याकुल ,
होती देख उन्हें हैरानी ।
बादल अपने दल संग आओ,
लेकर संग में खूब पानी,
झमक के बरसो गांव हमारे,
जीवित हो जाए किसानी।।
– हरी राम यादव, बनघुसरा, अयोध्या
