अमलतास और मैं
महक रहा है अमलतास
गुलमोहर पर भी आई बहार
हरे पत्तों से लदा पेड़ अब
तब्दील हुआ पीले झुमको में
हर शाख पर है फूल खिले
पत्तों की जगह पीले झूमर खिले
मानो खुशी से कर रहे नृत्य
जब चलती है ठंडी बयार
एक या दो ,पुष्प नहीं
पूरा वृक्ष हुआ है अलंकृत
इन पुष्पों के सम्मोहन से वशीभूत
चल पड़ती हूं मैं इनके पास
स्वर्ण आभा से तन अभिभूत
मन भी हुआ झंकृत
देख इनकी सुनहरी आभा
जी करता है बैठी रहूँ इनके तले
लहराते हुए यह पीले झूमर
इतना सुकून देते हैं मुझे
पर एक तुम हो निष्ठुर
जो हर समय रहते व्यस्त
अब मिलने भी नहीं आते
कर इंतजार तुम्हारा झड़ जायेंगे
यह सारे अमलतास के फूल
फिर साथ में रह जायेंगे
यह अमलतास और मैं
– रेखा मित्तल, चण्डीगढ़
