अनुमति – मीरा पाण्डेय

मत देना अनुमति तुम .

मुझे अपने दिल में रहने की .

.बसते हो फरेब जहां .

कौन बसे उस बस्ती में .

..आहिस्ता मनुहार की .

..प्रेम हर पल स्वीकार की .

मिले जहां सजल नयन .

कौन  रहे ऐसी बस्ती में .

…वीरान थी वो .

..जाले लगे दीवारो पे .

कोने कोने रंग भरी .

..शायद तुम्हे कब्जाने को .

….मत देना अनुमति .

मैं प्रतिकार करूंगी .

विद्रोही बन विद्रोह करूंगी .

धधक उठूँगी ज्वाला सी .

तुम्हारा ही सर्वनाश करूंगी .

कौन रहे .ऐसी बस्ती में

..जहां ना इंसान हो .

इंसानियत की ना दरकार हो .

झूठ फरेब से मिला .

रिश्तों का व्यापार हो .

मत देना अनुमति मुझे .

फिर लौट आने की .

.

मैं मंजिल चुन चुकी .

अकेले उसपे चलने की .

मैं स्वयं खुद मंजिल बनूं .

औऱ करू दर्शन जीवन की .

..नही चाहिए अनुमति किसी की .

.- मीरा पाण्डेय उनमुक्त, नई ,दिल्ली

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