अनुगीतिका – मधु शुक्ला

 

रूप पुस्तक के कई उपलब्ध हैं संसार में,

वृद्धि इनसे लोग करते ज्ञान के भंडार में।

 

लोग पढ़ते पुस्तकों को प्राय रुचि अनुरूप ही,

ये सखा बन साथ देतीं रुचि न लें प्रतिकार में।

 

लेखकों को मान,यश जो विश्व पुस्तक दिन दिया ,

वह सहायक बन गया है ज्ञान के विस्तार में।

 

क्षेत्र हर उन्नति किया है पुस्तकों की सीख से ,

ये सदा संलग्न रहतीं भावना बौछार में।

 

यदि किताबों की सुनें जन शांति जग में व्याप्त हो

है इन्हें विश्वास समता भाव‌ के संचार में।

— मधु शुक्ला , सतना, मध्यप्रदेश

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