कर रही थी खोखला
दिन प्रतिदिन भीतर से
उसके प्रेम की बेड़ियाँ
लड़की भ्रम में थी
शायद मुझसे
लगाव अधिक हैं
अचंभित हुई वह
जिस दिन मिट्टी की
माफि़क भरभरा गिरी
उसके प्यार की इमारत
खोखला कर दिया
भीतर तक उसे
दीमक की भांति
आखिर में बचे
कुछ अधूरे ख्वाब
कुछ बिना पोस्ट हुए खत
बेचैनियाँ और टुकडे
हालातों में लिपटे हुए
कोई शिकवा शिकायत नहीं
प्रेम के हिस्से आता हैं
हमेशा से ही अधूरापन।
– रेखा मित्तल, चण्डीगढ़
