होली – डा. इंदु अग्रवाल

दहन होलिका करके सारे, खेल रहे हैं फाग ।

शायर सब प्रेमिल धुन में , गा रहे होली राग ।।

 

छन्न पकैया छन्न पकैया छन्न के ऊपर चंदा।

अगला छन्न मैं तब कहुँ  जब तवज्जो दे हर बंदा ।।

 

दून में  खूब अब सजे , श्रीकान्त तिरे रंग।

सबसे बरजोरी करे , मचा रहा हुड़दंग।।

 

हुड़दंगों की टोली आई, लेकर बाजा ढोल ।

प्यारी  बहना इंदु जी , आज हो गईं गोल।।

 

मंजू जी का सर ऊँचा , हँसी में है कमाल।

उम्र भले हो ६  दशक, दिल है सोलह साल ।

 

भांग  पीकर कवियों की , कैसी बिगड़ी चाल।

कविता का रुप देख के , हुए सभी  बदहाल ।।

 

देखो भरते रोज़ ही, ग़ज़ब-गजब के स्वाँग।

हलधर जी भरें  लोटा, खूब चढ़ाते भाँग।।

 

दौड़ आत शिव मोहना ,ले ठण्डाई हाथ ।

खड़ी  द्वार है बहुरिया ,लट्ठ लिये है साथ।।

 

सुनाती है फाग उषा,कहती  हृद-उद्गार।

मार सोंटी कहें क्षमा , होली बस लठमार।।

 

मणि जी ले कर आ गयीं , गुझिया वाले थाल।

महिमा देवें प्यार से  , बिगड़े सबके हाल ।।

 

मीरा पकौड़ियाँ तलें , करें सब इंतजाम।

कोका कोला पी रहीं , भाँग का  नहीं नाम  ।।

 

रौनक मेला है लगा , नीरू  मौलस्री संग।

खुशियां भरें जीवन में ,होली के ये रंग।।

 

शाएरात  की भीड़ है,अजब गजब से रंग।

अम्बर  भई ग़ज़ल  पढ़ें, झूमें पीकर भंग।।

-डा. इंदु अग्रवाल, देहरदून , उत्तराखंड

 

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