श्वेत चाँदनी सी आभा, मां महागौरी आई हैं,
मन के हर कोने में, निर्मल ज्योति जगाई हैं।
अष्टमी का पावन दिन, शुभ आशीष बरसाता है,
हर दुख, हर अंधकार को, मां का तेज मिटाता है।
वृषभ पर विराजी माता, करुणा का सागर लहराए,
माथे पर चंद्र की छाया, जीवन को उजियारा बनाए।
चार भुजाओं में शक्ति, प्रेम और शांति का वास,
त्रिशूल से भय हर लेती, वरमुद्रा देती विश्वास।
तप की अग्नि में जलकर, रूप ये उजला पाया है,
त्याग और साधना से, जग को संदेश सुनाया है।
जो भी शरण में आया, मां ने उसे संवारा है,
सूखे मन के आंगन में, प्रेम पुष्प संवारा है।
भोले भाव से जो मां को, अपना सब कुछ मान ले,
उसकी हर कठिन डगर में, मां दीपक बन जान ले।
हे महागौरी, तुमसे ही हर शुभ कार्य सजे,
तेरी कृपा से जीवन में सौभाग्य के फूल खिले।
मन के मैल को धोकर, सच्चाई का रंग भरो,
हे माता, अपने भक्तों पर, सदा कृपा की वर्षा
-राजलक्ष्मी श्रीवास्तव,जगदलपुर राजिम,छत्तीसगढ़
