हे छलिया भागी पराइल कहा चढ़ले फगुनिया ना ।
कब से देखे छछनाइला मंद मुस्कनिया ना।
तू त कही के गइला कान्हा,
हम त हाली लौटी आइब राधा ।
एही से ना भावेला बेईमनिया ना ।
हे छलिया भागी ……….।
तू त बाड़ा बड़ा चितचोर,
कहेला कुछउ औरी करेला कुछ और।
कबसे बुलाइला तोहरो दिलजनिया ना।
हे छलिया भागी …….।
भइले वृंदावनवा सुना
फागुन मनवा लागे नाहीं कही ना।
रसिया दूभर कईला जिंदगनिया ना ।
हे छलिया भागी………।
अँसुवा से गोकुला डुबल जाला ,
याद में तोहरी लगेला जईसे भाला।
यमुना में डुबल जाला जवनियां ना ।
हे छलिया भागी पराइल कहा चढ़ले फगुनिया ना।
– श्याम कुंवर भारती ( राजभर)
बोकारो, झारखंड , मॉब.9955509286
