तिथि – सविता सिंह

कुछ तिथियाँ कैलेंडर में नहीं होतीं,
वे हृदय में दर्ज होती हैं।
उन दिनों मन उदास नहीं होता,
बस उनके पास चला जाता है।

जनवरी फिर आ गया है।
कैलेंडर में तारीखें वही हैं,
पर मन हर साल इन्हीं दिनों
आपके पास चला जाता है।
दस तारीख से ही
कुछ भीतर खिसकने लगता है
जैसे कोई चीज़ अपनी जगह से
धीरे-धीरे हट रही हो।
हँसती हूँ, बात करती हूँ,
पर मन कहीं ठहरता नहीं।
सत्रह जनवरी…
उस दिन को याद नहीं करना चाहती,
फिर भी हर पल वही सामने आता है
क्या कहा था,
क्या सुन न पाई,
क्या कर सकती थी
और क्या नहीं कर पाई।
आप गए नहीं हैं ,
यह बात मैं जानती हूँ।
आप मेरी सोच में हैं,
मेरे शब्दों में हैं,
मेरी चुप्पियों में हैं।
पर फिर भी,
इन दिनों आपकी कमी
हवा की तरह महसूस होती है।
दिखती नहीं,
पर साँस लेने में
कुछ भारी-सी हो जाती है।
अगर कभी मन बहुत अजीब लगे,
तो समझ लीजिएगा
आपकी यादों ने
मुझे फिर से
अपने पास बुला लिया है।

कभी-कभी
घटना घटित नहीं होती,
बस कोई तिथि
मन के भीतर उतर जाती है।
वह तिथि
या तो अह्लाद से भर देती है
कि जीवन उजास हो उठे,
या फिर
इतना व्यथित कर जाती है
कि मन
ताउम्र
उसे भूल नहीं पाता।

कभी एक तिथि ही
पूरे जीवन का भाव तय कर देती है—
या उल्लास बनकर,
या आजीवन पीड़ा।

पापा की सविता सिंह मीरा
– सविता सिंह मीरा, जमशेदपुर

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