चाँद पर हो आशियाँ – रुचि मित्तल

चाँद पर हो आशियाँ

जहाँ सिर्फ मैं

और तुम हो

और दूसरा कोई

बंधन न हो

जहाँ रास्ते

कदमों से नहीं

नियत से खुलते हों

जहाँ नाम

आवाज़ न माँगे

और पहचान

ख़ामोशी में पूरी हो।

चाँद पर हो आशियाँ

जहाँ सजदा

ज़मीन का मोहताज न हो

और दुआ

हाथ उठाने से पहले

क़ुबूल हो जाए

वहाँ खो जाना

पाने से कम न हो

और ठहर जाना

रुक जाना न कहलाए

मैं अगर

तुम तक पहुँचू

तो सफ़र कहला जाऊँ

और तुम अगर

मुझ में उतर आओ

तो मंज़िल बन जाओ।

चाँद पर हो आशियाँ

जहाँ इश्क़

किसी का नाम न ले

और फिर भी

सब कुछ हो

©रुचि मित्तल, झज्जर , हरियाणा

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