उनकी अदाओ पर हम मरते गए,
छुप-छुप के दीदार हम करते गए।
देख कर उनकी बेरुखी को यारो,
कभी उफ्फ कभी आहे भरते गए।
उनकी तंगदिली की बात क्या?
सितम के साये से गुजरते गए।
उसे अहसासे-इश्क़ न हुआ कभी,
जिसकी याद में अश्क झरते गए।
कहर बन के रह गई जब दूरियाँ,
तन्हाई के भंवर में फंसते गए।
जतन जीने के लाख किये मगर,
याद में उनकी निराश मरते गए।
– विनोद निराश, देहरादून
