चाह भी ख़ूब है,
आह भी ख़ूब है।
हर ख़ुशी के लिए,
डाह भी ख़ूब है।
झूठ का टूटता,
ब्याह भी ख़ूब है।
अक्षमों को यहाँ,
वाह भी ख़ूब है।
गूढ़ हर बात की,
थाह भी ख़ूब है।
प्रीति को फरवरी,
माह भी ख़ूब है।
दिल हमारा समझ,
शाह भी ख़ूब है।
-मणि अग्रवाल “मणिका”
देहरादून उत्तराखंड
