इक साल कम हो गया – विनोद निराश

सुनो जी ! लोग कहते थे,
मगर अब सच लगने लगा,
पुराना साल विदा क्या हो गया ?,
मेरी ज़िंदगी का इक साल कम हो गया।

वो चन्द पुरानी यादें,
कुछ किस्से ज़िंदगी के,
शायद सब रुखसत हो गया,
मेरी ज़िंदगी का इक साल कम हो गया।

तरसती रही आरज़ूएं ,
नामुकम्मल रही ख्वाहिशें ,
और कुछ बिन मांगे मिल गया,
मेरी ज़िंदगी का इक साल कम हो गया।

कुछ हमें छोड़ गए,
कुछ हमने छोड़ दिये,
कोई हमसे खफा हो गया,
मेरी ज़िंदगी का इक साल कम हो गया।

भीड़ में कुछ अपने थे,
मगर संग कुछ सपने भी थे,
किसी से हम तो कोई हमसे जुदा हो गया,
मेरी ज़िंदगी का इक साल कम हो गया।

किसी का मैं इंतज़ार करता रहा,
तो कोई मेरा इंतज़ार करता रहा,
इस कशमकश में निराश मन हो गया,
मेरी ज़िंदगी का इक साल कम हो गया।
– विनोद निराश, देहरादून

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