संस्कार - प्रीति आनंद

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संस्कार केवल एक शब्द नहीं, है यह एक क्रिया ,

मन,मस्तिष्क और शरीर शुद्धि की जीवन प्रक्रिया।

शामिल इसमें  अभीष्ट गुणों व प्रवृतियों का विकास,

कर सके मनुष्य जिससे घर और समाज में प्रकाश।

संस्कार लौकिक जीवन की पवित्रता का आधार,

पारलौकिक जीवन भी इससे हो जाता साकार।

सत्य, अहिंसा, प्रेम, शांति, सात्विक जीवन व ईश भक्ति,

इन्हें अपना बने संस्कारी,वो पाये जीव बंधन से मुक्ति।

ये देन इसी की,जो करते हम , नंदी, वृक्ष, पर्वत पूजा,

और ये जाना सदाचार,परोपकार सा धर्म ना कोई दूजा।

संत-सत्कार ,पितृ-श्रद्धा, मातृ-भक्ती संस्कार से ही आए,

असंस्कारी,चरित्रहीन मनुष्य, भला जग में किसको भाए।

संस्कारों की प्रथम पाठशाला ये जन्मभूमि और जननी,

सीखा जिनसे, जैसी होती 'करनी' वैसी ही होती 'भरनी'।

त्याग-तपस्या, दया-दान, देशप्रेम में करना न्यौछावार प्राण,

संस्कार ही सिखाता मानव को रखना अपना अभिमान।

बढ़ाए मान कुल, वंश का बहू-बेटी में जो हों ये संस्कार,

अप्रिय बातें सह, मुख से कुछ ना कह बचा लेतीं घर द्वार।

- प्रीति आनंद, इंदौर , मध्य प्रदेश