महाशिवरात्रि - डॉ. हरिप्रसाद दुबे

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vivratidarpan.com - भारत में आस्था और आध्यात्म की पावन परम्परा पर्व एवं उत्सव से सम्पृक्त है। दार्शनिक चिन्तन की मूलधारा मानव जीवन के बहुआयामी सन्देश से विराट मानवता को जोड़ती है। भारतीय जीवन दृष्टि स्वाभाविक रूप से प्रकृति से सम्बद्घ है। हमारी संस्कृति में शिव की अवधारणा सर्वव्यापी पूर्ण ब्रह्मï के विपुल रूप में ही समाहित रही है। शिव नित्य होने के कारण कालातीत है। लघु से विराट का चिन्तन आत्मसमर्पण के भाव से प्रेरित है। प्रेम के स्थान पर श्रेय का संपादन शिव को उस व्यक्ति से जोड़ता है जो दरिद्र एवं उपेक्षित है। शिव का व्यक्तित्व सामान्य व्यक्ति की भावनाओं का प्रतीक है।

सांस्कृतिक पर्वों में एक पर्व है - महाशिवरात्रि का पर्व। इस पर्व पर शिवभक्त प्रात:काल से उपासना आरंभ कर देते हैं। जगत पिता शिव और जगत माता पार्वती की यह आराधना परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व कल्याण के लिए की जाती है। विल्व पत्र द्वारा शिवाभिषेक किया जाता है जिससे पर्यावरण की रक्षा का प्रकृति में देवत्व के साक्षात्कार का जीवन्त संदेश मिलता है। नीलकण्ठ के रूप में शिव की विशेष महिमा मिलती है।

मानवता के कल्याण के लिए गरल पान शिव ही करते हैं। प्रत्येक महान कार्य बिना त्याग के अपूर्ण रहता है। प्रत्येक महामानव के पीछे त्याग अन्तर्निहित मिलता है। आत्मदान अनिवार्य होता है।

शिव का निवास कैलाश पर्वत मात्र तपोभूमि ही नहीं जलवायु के लिए भी सहायक है। कल्याण स्वयं शिव रूप में व्यक्त है। मानवता का कल्याण असमानता, अन्याय और हिंसा पर अंकुश लगाकर संभव है। क्रोध और अहंकार से दूर रहकर शिव की प्राप्ति संभव है। महाशिवरात्रि आनन्द का पर्व माना जाता रहा है।

वेद उपनिषद और अन्य ग्रंथों में प्राणी मात्र को पशु कहा गया है। अहं से आवृत्त जीव ही पशु है। पंचकृत्य सम्पन्न सर्वज्ञ, ईश पशुपति है। शिव का धर्म रूपी नन्दी वृषभ स्फटिक जैसा निर्मल है। नन्दी सीधे मार्ग पर चलता है। किसी को हानि नहीं पहुंचाता, वह सबका पोषण करता है। शिव का एक नाम नंदिकेश्वर है। नन्दी की आराधना धर्म की उपासना का विराट स्वरूप है। शिव स्वयं दिगम्बर रहकर भक्तों को दिव्याम्बरधारी बनाते हैं। सामान्य व्यक्ति जब आध्यात्मिकता से जुड़ता है तभी समाज की विषमता दूर होती है। प्रेम और सहयोग का पथ इस पर्व का संदेश मंत्र है। शिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की परम्परा है। चल और अचल शिवलिंग परम्परा में है। सभी देवताओं में शिव महादेवहैं। आर्य समाज में यह पर्व ऋषि  बोधोत्सव के नाम से विख्यात है। दयानन्द सरस्वती का भी इससे संबंध है। काशी का विश्व विख्यात विश्वनाथ मंदिर तथा अयोध्या के नागेश्वरनाथ मंदिर से प्राचीन आख्यान जुड़े हैं। झारखण्डेश्वर नाथ महादेव का प्राचीन मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है। यहां के शिवलिंग को उखाडऩे के कई प्रयास किये गये किन्तु असफलता ही मिली। एक जनश्रुति के अनुसार झारखण्ड में इसे शैव मतावलंबियों द्वारा लाया गया। मुख्य द्वार पर उडिय़ा भाषा में शिलालेख अंकित है। विघ्नेश्वरनाथ मंदिर का शिवलिंग दुर्लभ श्याम प्रस्तर से निर्मित है। राम के पुत्र लव और कुश द्वारा निर्मित कराये गये एक सहस्र शिवमंदिरों में विघ्नेश्वर नाथ जी के मंदिर का अंतिम स्थान माना जाता है।  लोधेश्वर नाथ, सिद्धेश्वर नाथ मंदिर प्राचीनकाल के शैव स्थान हैं।

महादेवा में लोधेश्वर महादेव की दिव्य प्रतिमा 52 शिवलिंगों में से एक है। फाल्गुन मास की त्रयोदशी तिथि को शिवरात्रि पर जनमानस उमड़ता  है। कांवरियों का यह श्रद्धा केंद्र रहता है। लोक मान्यता के अनुसार इस शिवलिंग का रंग परिवर्तित होता है। यहां का शिव सरोवर स्नान के लिए प्रसिद्ध है। उतरौला का दुख हरणनाथ मंदिर अपने प्राचीन शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। शिवरात्रि पर्व पर यहां विराट समारोह की परम्परा है।

महाशिवरात्रि पर्व महान आदर्शों के संकल्प का पर्व है। शिव की आराधना करके हमें उन गुणों का स्मरण करना होता है जिनको स्थापित करके समाज को जीवित रखा जा सकता है। इस दिन देश के सभी शिवमंदिरों में एक आध्यात्मिक और धार्मिक चिन्तन प्रवाहित होता है। देश के अनेक शक्ति पीठों में शिव की उपासना की जाती है। समग्र राष्टï्र किसी न किसी रूप में शिव की पूजा से जुड़ता है। स्वयं गरल पान करके जन-जन को अमृत पान कराने का प्रयास शिव ही करते हैं।

धार्मिक भावना के साथ सांस्कृतिक चेतना जागृत होती है। काव्य, दर्शन, नृत्य, नाटक, चित्र संगीत मूर्ति सब पर शिव का प्रभाव है। आज शिव की प्रासंगिकता अधिक बढ़ गयी है। मानव जीवन के शाश्वत मूल्यों की पुनस्र्थापना में महाशिवरात्रि   पर्व का अनूठा स्थान है।

जनमानस में प्रेम, त्याग के मूलमंत्र का संदेश देता है  शिव का यह पावन पर्व। शिवरात्रि पर सारा देश आध्यात्मिक एवं दार्शनिक परिवेश में झूम उठता है। (विभूति फीचर्स)