गीत - जसवीर सिंह हलधर

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हमारी जिंदगी की नींव ही पर्यावरण है ।

धरा पर पेड़ पौधों का सजा जो आवरण है।।

न डालो मैल नदियों में न काटो पेड़ भाई ।

यही सौ रोग रोके एक ऐसी है दवाई ।।

अभी जागे नहीं तो हानि होना है सुनिश्चित ,

बुलावा रोग का,बीमारियों का यह वरण है ।।1

सभी ये जानते तो हैं नहीं क्यों मानते हैं ।

समंदर में परीक्षण की छतरियां तानते हैं ।।

इसी कारण उठें तूफान सागर में अनौखे ,

हुआ पथ भ्रष्ट जाने क्यों हमारा आचरण है ।।2

अकेली भूमि पर ही आदमी का कारवां है ।

यहीं पैदा , यहीं मरना ,यहीं होना जवां है ।।

अभी कलयुग की दस्तक है धरा पर शोर देखो ,

नदी दूषित हवा दूषित दुखी वातावरण है ।।3

हिमालय क्रोध में है और सागर में तपिस है ।

दुखी है राम हमसे और गुस्से में कपिस है ।।

इसारा कर रहे भूचाल सागर के बबंडर ,

हमारी गलतियां "हलधर" हमारा आमरण है ।।4

- जसवीर सिंह हलधर, देहरादून