दोहे - अनुराधा पाण्डेय 

 | 
pic

१*

देह प्राण मन बुद्धि सब,लगते एकाकार।

भावोदधि हृद हो गया, जब से जागा प्यार।।

२*

प्रेमोत्कर्ष स्वभावतः यदि समीप हो प्रेय।

वाँछित पीड़ा भी लभे, प्रेम प्राप्त कर ध्येय।।

३*

अनुप्राणित मम् प्राण है, हो तदर्थ तुम मीत।

अधर छुए तव तर्जनी,उद्भासित हो गीत।।

४*

अद्भुत बातें नेह की, गुने नहीं संसार।

अंतर्वैयक्तिक बना कृष्ण कृष्णिके प्यार।।

५*

कृष्ण सनातन ब्रह्म हैं, शेषनाग बलराम।

वेदऋचा सम गोपियाँ, गुनिये आठो याम।।

६*

राधा बिन मैं "श्री" रहित, केवल कोरा श्याम।

परम् सेव्य श्री राधिके! प्रतिबिंबित उरधाम।।

- अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका , दिल्ली