दायित्व निर्वहन से ईश्वरीय अधिकार की प्राप्ति - मुकेश मोदी

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vivratidarpan.com - भारतीय सनातन संस्कृति में पैतृक परम्पराओं और लौकिक सम्बन्धों का बहुत महत्व है जो प्राप्तियों का अधिकारी बनाने के साथ साथ प्रतिनिधित्व का दायित्व भी सिखाता है । सम्बन्ध प्रेम का प्रतीक है तो आज्ञाकारिता की शिक्षा भी देता है । पिता व पुत्र का सम्बन्ध सबसे महत्वपूर्ण है । पिता अपने पुत्र को धन सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बनाने के साथ-साथ अपने परिवार की मर्यादाओं और परम्पराओं का दायित्व भी सम्भलाता है ।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से आत्मा के रूप में हमारा पिता परमात्मा है । जिस प्रकार लौकिक अथवा सांसारिक जीवन में हम अपनी पैतृक गरिमाओं, संस्कारों और मर्यादाओं को आचरण में लाते हुए उनका प्रतिनिधित्व करते हैं, उसी प्रकार परमात्मा की सन्तान होने के नाते हमें उनके गुणों, कर्तव्यों और विशेषताओं का प्रतिनिधित्व अपने आचरण द्वारा करना चाहिए ।

मानव जाति द्वारा भौतिक जगत, सामाजिक जगत, आर्थिक जगत व आध्यामिक जगत में अब तक की गई उन्नति, विकास व प्रगति इस बात का प्रमाण है कि मनुष्यात्मा में परमात्मा के समस्त गुण सक्रिय हैं, किन्तु प्रत्येक आत्मा समान रूप से आत्मविकास नहीं कर पाती ।इसका मुख्य कारण यही है कि अज्ञान अन्धकार के कारण इन आत्माओं को विश्वास ही नहीं हो पाता कि ईश्वरीय सन्तान होने के नाते उनमें परमात्म प्रदत्त समस्त गुण व शक्तियां विद्यमान है । समाज में अक्सर हम देखते हैं कि कुछ लोगों को अपनी पैतृक महानता का बोध होने के कारण वे उसकी गरिमा व मर्यादाओं को बाल्यकाल से ही अंगीकार करते हुए उनका प्रतिनिधित्व करते हैं । इनसे इतर कुछ लोग पैतृक मर्यादाओं और परम्पराओं से अनभिज्ञ रहकर अपना चारित्रिक जीवन दीन-हीन अवस्था में व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं । जीवन पर्यन्त उन्हें परमात्मा की सन्तान होने का बोध ही नहीं हो पाता, इसलिए वे अपना जीवन महान बनाने के अधिकार से वंचित रह जाते हैं ।

हर मनुष्यात्मा को अपने जीवन में सुख, शान्ति और आनन्द प्राप्त करने का अधिकार है जिसका मुख्य स्रोत केवल एक परमपिता परमात्मा है । इसलिए यह अधिकार प्राप्त करने के लिए उसे स्वयं में यह विश्वास जगाना होगा कि वह परमात्मा की सन्तान है । यह स्मृति स्थाई रूप से कायम रहे कि सर्व गुणों, सर्व शक्तियों के सागर उस परमात्मा की सन्तान होने के नाते हमारे भीतर भी वे समस्त गुण व शक्तियां विद्यमान हैं । यह स्मृति जागृत होते ही हमारे भीतर एक शुद्ध अभिमान प्रस्फुटित होगा जिससे हम इन्हीं गुणों व शक्तियों को अंगीकार करते हुए अपना जीवन संचालित करना प्रारम्भ करेंगे । गुणों का विकास होने से हमारा व्यक्तित्व दिव्य बनता जाएगा, मानसिक संकीर्णता और बुद्धि की दरिद्रता समाप्त होने लगेगी । मन की इस उच्च अवस्था से जीवन में अलौकिक आनन्द का अनुभव होने लगेगा। हमारे कर्म व्यवहार से सबको यह अनुभव होगा कि हम परमात्मा का ही प्रतिनिधित्व कर रहे हैं ।

हम सर्वशक्तिमान परमात्मा की सन्तान होने के नाते हम इस संसार में उसके प्रतिनिधि हैं। इस विश्वास को दृढ़ करने से ही मन के धरातल पर सुप्त अवस्था में पड़े गुण व शक्तियां जागृत होंगी । गुणों और शक्तियों के सागर परमात्मा से हमें कोई स्थूल सम्पदा प्राप्त नहीं होती बल्कि सूक्ष्म आत्मिक शक्तियां ही प्राप्त होती हैं । जहां अधिकार है, वहां दायित्व भी होते हैं । जिस प्रकार परमात्मा की सम्पदा अर्थात दिव्य गुण व शक्तियों के हम पिता पुत्र के सम्बन्ध के नाते से अधिकारी हैं तो ईश्वरीय कर्तव्य का दायित्व भी हमारे कन्धों पर है। ये सार्वभौमिक नैसर्गिक सिद्धान्त है कि अधिकार व कर्तव्यों के क्रम में कर्तव्य पहले स्थान पर आता है । किसी कार्यालय में पूरे माह काम करने के पश्चात् ही वेतन मिलता है, मजदूर पूरे दिन मेहनत करके शाम को मजदूरी पाता है । अर्थात् कर्तव्य निर्वहन के पश्चात् ही अधिकार की प्राप्ति होती है ।

जिस प्रकार लौकिक दुनिया में माता पिता सन्तान को जन्म ही नहीं देते बल्कि उसके जीवन के विकास व सुरक्षा की व्यवस्था भी करते हैं । उसी प्रकार परमात्मा भी सृष्टि रचने के साथ-साथ प्रकृति के पांच तत्वों के माध्यम से इसके सहज संचालन का कर्तव्य भी निभाता है ताकि प्रत्येक प्राणी सुख शान्तिपूर्वक अपना जीवन बिता सके । परमात्मा का प्रतिनिधि होने के नाते मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह सृष्टि संचालन व पालन में यथासम्भव सहयोग करे। सहयोग की विधि केवल यही है कि हम ऐसे कर्म करें जिसमें हमारी और औरों की आध्यात्मिक उन्नति समाई हो तथा संसार में चारों तरफ सुख शान्ति का विस्तार हो। अपना चारित्रिक विकास करने से हमारा यह मन्तव्य स्वतः ही पूरा हो जाएगा। संयमित मन से प्रत्येक ईश्वरीय मर्यादा का पालन धर्म समझकर करने से स्वतः ही ईश्वरीय कर्तव्य का प्रतिनिधित्व होता रहेगा ।

याद रहे कि केवल अपने सुखाधिकार का चिन्तन करने वाला स्वयं के एकांकी हित में बंधे रहकर अपना प्रत्येक कर्म ईश्वरीय कर्तव्य के विरूद्ध ही करता है । इसलिए अपने सुख व कल्याण के साथ साथ औरों का हित भी वांछनीय है । सृष्टि की और दृष्टि घुमाकर देखें तो ज्ञात होगा कि प्रकृति प्रदत्त अनेकानेक भोग की सामग्रियां हमारे लिए उपलब्ध हैं किन्तु एक भी वस्तु का उपयोग प्रकृति स्वयं नहीं करती । इस प्रकार अपने आप में प्रकृति हमारे लिए महान, त्यागी और परोपकारी है । प्रकृति के समान हमें भी त्यागी, परोपकारी और परमार्थी बनना चाहिए । परमात्मा से हमें उपहार स्वरूप प्राप्त बल, बुद्धि, विद्या, धन, सम्पत्ति का कुछ अंश हमें ईश्वरीय कर्तव्य के निर्वहन में लगाना चाहिए। परमात्मा के कार्य में सहयोगी बनने की प्रेरणा, क्षमता और सामर्थ्य जगाने के लिए हमारा समस्त विकारी, भ्रामक और नश्वर वासनाओं से दूर रहना अनिवार्य है । समस्त दैहिक भोग और वासनाएं हमारी मानसिकता को निकृष्ट बनाकर हमें ईश्वरीय कर्तव्यों से विमुख करती हैं । आत्म संयम द्वारा अन्तर्चेतना में दिव्य गुणों के विकास से ही ईश्वरीय कर्तव्य में सहयोग करना सम्भव है ।

यदि  हमारे अन्दर यह धारणा दृढ़ हो जाए कि हम परमात्मा की अतिप्रिय और आज्ञाकारी सन्तान होने के नाते इस संसार में उसके प्रतिनिधि हैं तो निश्चित रूप से समस्त सांसारिक वासनाओं और तुच्छ सामग्रियों से वैराग्य उत्पन्न हो जाएगा ।

जब तक मनुष्य को स्वयं के श्रेष्ठ जीवन, श्रेष्ठ कर्तव्य और अपनी महानता पर विश्वास नहीं होगा, तब तक उसका चारित्रिक पतन होता ही रहेगा । इसलिए प्रत्येक मनुष्य का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने और सम्पूर्ण सृष्टि के हितार्थ वासनाओं के चंगुल से निकलकर आध्यात्मिक प्रकाश की ओर आगे बढ़े । तब उसे यह एहसास होगा कि वह कितना महान और गुणवान है, उसका स्वरूप भी वैसा ही है जैसा परमात्मा का है । निरन्तर इन अनुभूतियों से ही मनुष्य के अन्तर्मन में जमी हुई सारी क्षुद्रता, दीनता और निकृष्टता निकलती पाएगी । संसार की निकृष्टतम वासनाओं में उलझकर हम अपने ही सत्य अविनाशी आत्म स्वरूप से विस्मृत हो गए हैं। इसलिए फिर से आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ स्वयं में परमात्म प्रदत्त व अर्न्तनिहित गुण और शक्तियों को पहचानकर उन्हें ईश्वरीय कर्तव्यों के निर्वहन हेतु निस्वार्थ भाव से लगाएं । निश्चित रूप से यह कर्तव्य निभाकर परमात्मा से हम वह अधिकार प्राप्त कर लेंगे जिसकी हर मनुष्य कामना करता है । समस्त विकारों से मुक्ति पाकर स्वयं के पवित्र आत्म स्वरूप में स्थाईत्व ही परमात्मा से प्राप्त होने वाला पारलौकिक अधिकार है जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रहता ।

 - मुकेश कुमार मोदी, बीकानेर, राजस्थान। मोबाइल नम्बर 9460641092