हिंदी ग़ज़ल - जसवीर सिंह हलधर

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बेवाक सलीका रिंदों का ,शर्माने का कुछ काम नहीं

बेशक पैमाने टूट रहे , साकी पर कुछ इल्ज़ाम नहीं

दिल्ली की हवा विषैली है नेता खुश हैं अवाम नहीं

कारण कारण सब खेल रहे ,दिखता कोई परिणाम नहीं

पंजाब और हरियाणा के , धूंए से दिल्ली सुबक रही ,

मयखाना दूषित है सारा , साकी को भी आराम नहीं

जीवन नीलाम किया हमने , मयख्वार बदनाम हुए ,

जो वक्त मुकर्रर मिलने का , आयी वो कोई शाम नहीं

हम चाक गिरेबां बैठे थे ,बस एक नज़र डाली उसने ,

दीवाना हमको मान लिया , होंठों पर आया नाम नहीं

बेवफ़ा हुआ वो इतना क्यों , मुमकिन है कुछ कारण होगा ,

ऐसी भी क्या मजबूरी है आया कोई पैगाम नहीं

अफसाने अब तो पहुंचा दे , हवा तू उसके कानों तक ,

गुलची नासाज चमन में है ,पाया उसको गुलफाम नहीं

बेज़ार मुंतजिर बैठा है , साकी भी अब हँसते उस पर ,

मयखाना ऊब गया उससे हाथों से छूटा जाम नहीं

शायर क्या ग़ज़ल कही तूने सच्चे गहरे हैं शे' सभी ,

माना "हलधर" तू शायर है ,चलता फिरता हज्जाम नहीं

- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून