ग़ज़ल - विनोद निराश

 | 
pic

वो दिल को मेरे जलाते रहे,

सब्र को मेरे आजमाते रहे।

फकत हम ही तो रहे प्यासे,

सबको आँखों से पिलाते रहे।

दावा-ए-उल्फत किया हमसे,

दिल रकीब का बहलाते रहे।

वो रहे बेखबर ख्याले-यार से,

और हम खुद को जलाते रहे।

रखा सदा महफूज़ उसे दिल में,

जो तीरे-नज़र हमपे चलाते रहे।

जो रहे हमसे बेखबर दानिस्तां,

तोहमत हमपे वही लगाते रहे!

बेशक रहे गाफिल हमसे मगर,

निराश रस्में-इश्क़ निभाते रहे!

- विनोद निराश, देहरादून